धर्म-विधर्म-सुधर्म-कुधर्म-अधर्म ==================== click here धर्म शब्द का विश्लेषण करने चला हूँ तो आपका बतला दे कि संसार धर्म केवल एक ही हो सकता है । यह शाश्वत सत्य है । इसे बदला नहीं जा सकता । यदि आपको कोई कहे कि धर्म अनेक होता है, तभी समझ लीजिए कि वह व्यक्ति आपका हितैषी नहीं हो सकता । या तो वह ठग है, चापलूस है या चोर है, जो आपको लूट लेगा । आप कहेंगे कि हम तो अब तक यही सुनते आएँ हैं कि धर्म अनेक होता है, जैसे---हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, इसाई धर्म, सिक्ख-धर्म, जैन-धर्म, बौद्ध-धर्म, यहुदी-धर्म, पारसी-धर्म । आदि । ये सब क्या है ? क्या ये सब धर्म नहीं है ???? तो मेरा उत्तर होगा, नहीं ये सब धर्म नहीं है । तो फिर धर्म है क्या ???? मित्रों !!! धर्म कहते हैं गुण को । गुण को जीवन में धारण किया जाता है । गुण सदैव गुणी में होता है । गुण गुणी से कभी अलग नहीं हो सकता । इसीलिए महाभारतकार ने इसका निर्वचन इस प्रकार से किया है---"धारणाद् धर्मः इत्याहुः धर्मो धारयते प्रजा । यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्मः इति निश्चयः ।।" (महाभा...
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जून, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
जीवन और संघर्ष
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जीवन संघर्षों का खेल है । जो इन संघर्षों का डटकर मुकाबला करता है, वह संसार सागर से पार कर जाता है । जो संघर्षों से डर जाता है, घबरा जाता है, वह संसार सागर में भटकता रहता है । संघर्ष करने के साथ-साथ सावधानता भी आवश्यक है । जो सावधान नहीं रहेगा, वह परिश्रम करके भी असफल हो जाएगा । सही दिशा में और सही नियम के साथ परिश्रम करना चाहिए । सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि जीवन में कर्मों के प्रति निरन्तरता हो । यदि जीवन में किसी कार्य के प्रति निरन्तरता नहीं है, हडबडाहट या शीघ्रता है तो भी सफलता मिलने से रही । बार-बार अपने उद्देश्य बदल लेना , अदूरदर्शिता व छटपटाहट का परिचायक है । ऐसा व्यक्ति कहीं स्थिर नहीं होता । जो स्थिर नहीं हो सकता, उसकी सफलता में संदेह बना रहता है । स्थिरता सफलता का भी परिचायक है । बडे-बडे मनीषी स्थिर होकर ही बहुत आगे बढ गए । प्रायः करके एडीसन का नाम लिया जाता है कि उसने बल्ब का आविष्कार किया । किन्तु बहुत कम लोगों को पता होगा, कि इस सफलता के पीछे बहुत सी असफलताएँ छिपी हुई है । कई बार उसे इस कार्य में असफलता मिली । किन्तु वह कभी घबराया नहीं । लगातार कार्य में लगा रहा, बिन...